Culture

शांद महायज्ञ का धूमधाम से आयोजन

दिसंबर २३२४, ननखड़ी, शिमला ज़िला, हिमाचल प्रदेश, भारत:

२३ दिसंबर को, जब मै जागा माटी, ठोंड़ थाना, ननखड़ी पहुँचा, तो मैंने देखा कि वहाँ बहुत सारे लोग इकट्ठा हुए हैं। गाँव में हर  तरफ लोग ही लोग थे, और चारों ओर सेब के बगीचों में भी लोग इकट्ठा हुए थे – हजारों के हिसाब से लोग आए हुए थे। मैं ये सब देख कर बहुत हैरान था, कि यहाँ क्या हो रहा है।

मैंने एक स्थानीय आदमी से पुछा तो उन्होंने मुझे बताया कि यहाँ पर एक महायज्ञ का आयोजन हो रहा है। मैंने उनसे महायज्ञ का कारण पुछा तो उन्होंने बताया कि इस महायज्ञ को “ शांद महायज्ञ” कहा जाता है, और इस महायज्ञ का आयोजन इस लिए किया जाता है ताकि गाँव की ख़ुशहाली रहे, गाँव मै अच्छा मौसम रहे, बारिश और बर्फ़ समय से हो, गाँव में कोई लडा़ई झगड़ा ना हो, कोई बीमारी ना फ़ैले और बाक़ी बहुत कामनाओं की पूर्ति हो। इस साल शांद महायज्ञ ९० (90) साल के उपरान्त आयोजित हुआ है।

उसी समय सामने से काफी लोग जोश में नाचते हुए आते दिखाई दिऐ। किसी के हाथ में तलवार थी तो किसी के हाथ में बंदुक, और चेहरे पर खुशी के साथ वो एक स्थानीय गाना गा रहे थे। ये गाना देवी देवताओ के स्वागत के लिये गाया जाता हैं, जेसे कि भजन। मैं ये सब देख कर बहुत भावुक हो गया, और फिर मेरे मन ने कहा कि अब मुझे ये शांद महायज्ञ अच्छे से देखना है। 

वहाँ पर जो लोग तलवार लेकर नाच रहे थे उनको “ खूंद ” कहा जाता हे – खूंद का मतलब गांव का रक्षक होता है। वो लोग तलवार के साथ नाच कर अपनी शक्ति और बल का प्रदर्शन कर रहे थे, और साथ मै देवी देवताओं का स्वागत कर रहे थे।

मैंने वहाँ एक बात और देखी कि दो आदमी पीली धोती पहने हुए थे। उनके साथ काफ़ी सारे लोग बातचीत कर रहे थे। मैंने एक स्थानीय आदमी से बात कीं तो उन्होंने मुझे बताया कि ये दो पीली धोती पहने हुए आदमी “ गूर ” है। मैने उनसे गूर का मतलब पुछा तो उन्होंने मुझे बताया कि जिन लोगो में देवी देवताओं की शक्ति आ जाती हैं उन्हें गूर कहते हैं। फिर उन्होंने मुझे बताया कि ये जो दो गूर है इनके साथ जो लोग बातचीत कर रहे हैं, वो लोग मन्दिर कमेटी के सदस्य हैं, जैसे मन्दिर का पुजारी।

मुझे उनकी बातचीत समझ मे नहीं आ रही थी क्यूँकि वो लोग अपनी स्थानीय भाषा में बात कर रहे थे। फिर मैने एक स्थानीय आदमी से पुछा, तो उन्होंने बताया गाँव के लोग मन्दिर के पुजारी को अपनी और गाँव की समस्याएं बता रहें हैं, फिर पुजारी गाँववालों कि समस्याएं देवी देवताओ के ‘गूर’ के सामने रखते हैं। 

मैने देखा की गूर में देवी देवताओ की शक्ति आ चुकी थी और जितने भी गूर वहाँ पर थे, उन्होंने गाँव की पूरी परिक्रमा की और देवी देवताओं को जहाँ गलत लगता था तो वहाँ पर रुक कर एक बली चढ़ाते थे। बली में नारियल चढ़ाया जाता था। मुझे ये सब देख कर बहुत अच्छा लगा, “कि मानो तो सब कुछ है, और ना मानो तो कुछ भी नहीं है”।

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